ख़लिश सताती है शाम के बाद
तेरी याद आती है शाम के बाद
दिन तो जैसे भी काट लेता हूं मैं
तन्हाई खाती है शाम के बाद
स्याह हो जाता है आसमान
चांदनी फैल जाती है शाम के बाद
वीराना पसर जाता है कमरे में
बैचेनी सताती है शाम के बाद
कोई संगीत बजता है हवा में
फिज़ा गीत गाती है शाम के बाद
पढ़ने बैठता हूं खत मैं उसके
एक नज़्म रूलाती है शाम के बाद
_बेख़बर