"ख़ामोश हूँ मैं"...
हर एहसास को आँचल में समेटे हुए,
मुस्कान में दर्द छुपाए, ख़ामोश हूँ मैं।
जो कहना था, वो आँखें कह गईं सब,
लब थरथराए मगर, ख़ामोश हूँ मैं।
अब आह भी ज़ेवर सी लगती है मुझे,
दर्द को ओढ़ कर भी, ख़ामोश हूँ मैं।
सन्नाटा रूह में धीरे-धीरे बसता गया,
अब आवाज़ों से थककर, ख़ामोश हूँ मैं।
रात भर अपने ही साये से बातें करती हूँ,
सुबह होते ही दुनिया के लिए, ख़ामोश हूँ मैं।
घर की दीवारों से पूछो ज़रा,
कितनी बार टूटी हूँ, फिर भी ख़ामोश हूँ मैं।
सहमी नहीं, थमी नहीं, बस ठहर सी गई,
तूफ़ानों से गुज़र कर भी, ख़ामोश हूँ मैं।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️