Hindi Quote in Motivational by Vedanta Life Agyat Agyani

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धर्म — आस्था का व्यापार या आत्मा का जागरण ✧

आज का धर्म अपने मूल स्वरूप से बहुत दूर खड़ा है।
वेद कहते हैं: *“ऋतम् सत्यम् परं ब्रह्म”*¹ — सत्य ही ब्रह्म है, और धर्म का काम उस सत्य की खोज है।
उपनिषद का घोष है: *“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः”*² — आत्मा को ही देखना और जानना धर्म का मार्ग है।
लेकिन वर्तमान धर्म का केंद्र आत्मा का जागरण नहीं रहा। आज धर्म सिर्फ़ महिमा, जय-जयकार, अनुष्ठान और पूजा समितियों तक सीमित हो गया है।

गीता कहती है: *“इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्…”*³
(यह सनातन योग मैंने सूर्य को कहा था, वही परंपरा से चलता रहा।)
यानी धर्म का बीज कालातीत है, परंतु उसकी रक्षा तभी होती है जब आत्म-विकास होता है। आज वही बीज बाहरी व्यापार में दब गया है।

असल धर्म आत्म-विकास का मार्ग है।
जब आत्मा भीतर से बढ़ती है, तब श्रद्धा, भक्ति और विश्वास अपने आप फूटते हैं। यही जीवित धर्म है।
कबीर ने सीधा कहा: *“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥”*⁴
(ज्ञान बाहर नहीं, भीतर के प्रेम और जागरण में है।)

लेकिन आज धार्मिक नेता आत्महीन हैं।
वे शास्त्रों और महान गुरुओं के वचनों को उधार लेकर अपनी सत्ता गढ़ते हैं।
उनसे जब कोई प्रश्न किया जाए, तो उत्तर यही मिलता है—“तुम्हारे पास श्रद्धा नहीं है”, “तुम नास्तिक हो”, “तुम धर्म विरोधी हो।”
यह उत्तर नहीं, बल्कि अपनी खोखली स्थिति को ढकने का बहाना है।


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✧ समापन ✧

धर्म का प्रश्न यह नहीं है कि श्रद्धा है या नहीं।
धर्म का प्रश्न यह है कि श्रद्धा भीतर से क्यों नहीं फूट रही?

जब तक यह प्रश्न नहीं पूछा जाएगा, तब तक हर धार्मिकता महज़ अभिनय रहेगी।
बुद्ध ने भी कहा: *“अप्प दीपो भव”*⁵ — अपने दीपक स्वयं बनो।
यानी धर्म तभी जीवित होगा जब मनुष्य अपनी आत्मा से भक्ति और विश्वास को उगलेगा—
बिना उधार लिए, बिना मजबूरी के, बिना डर के।


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✍🏻 — 🙏🌸 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲


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✧ संदर्भ (References) ✧

1. ऋग्वेद 10.190: “ऋतम् सत्यम् परं ब्रह्म” – सत्य ही परम ब्रह्म है।


2. बृहदारण्यक उपनिषद् 2.4.5: “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः” – आत्मा को ही देखना चाहिए।


3. भगवद्गीता 4.1–2: “इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्…” – यह सनातन योग परंपरा से प्रवाहित है।


4. कबीर वाणी: “पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ…” – ज्ञान ग्रंथों से नहीं, भीतर की जागृति से है।


5. धम्मपद 160: “अप्प दीपो भव” – अपने दीपक स्वयं बनो।

Hindi Motivational by Vedanta Life  Agyat Agyani : 112000938
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