Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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हास्य व्यंंग्य - यमलोक व्यापी अभियान
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आज अलख सुबह मित्र यमराज आये
जाने क्यों थे वो बड़े मुरझाए,
मैंने उन्हें प्यार से बैठाया
खुद दो कप चाय बनाकर लाया
इज्जत से प्लेट में नमकीन साथ लेकर आया,
यमराज उठा और मेरे हाथों से ट्रे लेते हुए कहने लगा -
आप भी न प्रभु! नाहक ही परेशान हो जाते हो
इतना लाड़ प्यार देकर रुला देते हो।
अब बैठिए, आप भी मेरे साथ चाय पीजिए
साथ ही यह भी बता डालिए
कि आपका भविष्य क्या है?
यमराज का प्रश्न सुनकर मैं चौंक गया
और पूछ बैठा -ये कैसा सवाल है तेरा?
फिर मेरे भविष्य की तुझे इतनी चिंता क्यों है ?
यमराज अकड़ गया -
यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है प्रभु!
मुझे तो आपके बुढ़ापे की चिंता है
इसलिए कि आप दो बेटियों के बाप हैं,
लगता है यही आपके लिए सबसे बड़ा अभिशाप है।
मुझे गुस्सा आ गया - अच्छा तो अब तू चाय पी
और चुपचाप मेरे घर से निकल जा।
यमराज बिल्कुल नहीं हड़बड़ाया
चाय पीते हुए बोला -
प्रभु जी! आप नाहक अपना बीपी बढ़ा रहे हैं,
मेरे कहने का आशय समझ ही नहीं रहे हैं।
मैं तो बस इसलिए परेशान हूँ
कि कल जब आप बेटियों के हाथ पीले कर विदा कर देंगे,
तबका सोचिए है कि आप दोनों को क्या करेंगे?
कौन आपकी देखभाल करेगा, आपका ध्यान रखेगा?
फिर कल को आप दोनों में कोई एक
इस दुनिया से विदा हो गया,
तब दूसरा अकेले भला किसके भरोसे और कैसे रहेगा?
किसके भरोसे जियेगा?
मैं गंभीर हो गया - फिर मुस्कराया
कह तो तू सही रहा है यार
पर तेरी चिंता थोड़ी जायज, थोड़ी नाजायज है,
आजकल की बेटियां बेटों से कम नहीं हैं,
वैसे भी बेटियाँ माँ बाप सबसे करीब होती हैं,
आज की बेटियों बेटों जैसी हो गई हैं,
हर काम बेझिझक हौसले से कर रही हैं
रुढ़ियों को तोड़ माँ -बाप का दाह-संस्कार भी कर रही हैं।
फिर तू ही बता! बेटों में कौन सा सुर्खाव के पर लगे हैं।
अब आज का समय बहुत बदल गया है यार
यह हम सबको समझने की जरूरत है,
आज के कितने बेटे बुढ़ापे में माँ-बाप को
उचित मान-सम्मान संग महत्व देते हैं?
उनके स्वाभिमान को तार-तार नहीं करते हैं?
अपनी सीमा में रहकर मर्यादित व्यवहार करते हैं?
खून के आँसू नहीं रुलाते हैं?
जीते जी मौत के मुँह में नहीं ढकेलते हैं?
और वे ऐसा इसलिए करते हैं कि अब वे बच्चे नहीं
बड़ा कमासुत और समझदार हो गये हैं,
जिन्हें अपने ही बुजुर्ग माँ- बाप बोझ जैसे लग रहे हैं
ऐसा दिखाने का स्वाँग रच रहे हैं
कि अब उनके ही माता-पिता
उनके सबसे बड़े दुश्मन हो गये हैं।
बेटियाँ हैं तो कम से कम इतना संतोष तो है
बुढ़ापे में बेटे-बहू को कोसने से तो फुर्सत है।
उम्मीदों के टूटने का कोई डर तो नहीं है,
जीते जी मरने का अफसोस का दंश नहीं सहना है
अंतिम संस्कार के लिए कम से कम
बेटे के इंतजार में सड़ना तो नहीं है।
फिर तू तो है न यार? आखिर तू क्या करेगा?
क्या यारी के नाम पर सिर्फ स्वार्थ के गीत गायेगा?
और हमें यूँ ही आसानी से भूल जाएगा?
क्या तू भी कल हमारे किसी काम नहीं आयेगा?
वैसे तू नहीं चाहेगा तो भी
हम दोनों यमलोक आ जायेंगें।
वहीं तेरे घर में धूनी रमायेंगे,
तेरा ही खाकर जमकर हुड़दंग मचाएंगे,
तेरे सवालों का जवाब पाने के लिए
यमलोक व्यापी अभियान चलाएंगे,
सरेआम चर्चा कराएंगे
अपने मित्र यमराज के जयकारे लगाएंगे,
दोनों मिलकर एक नया इतिहास बनायेंगे।

सुधीर श्रीवास्तव

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 111999405
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