क्यों हर बार औरत ही?
हर जगह देखो,
इधर देखो, उधर देखो,
टीवी देखो, सीरियल देखो।
हर जगह औरत को मजबूर और लाचार देखो,
हर तरफ़ औरतें देती रहें परीक्षा —
क्यों वो सहे और महान कहलाए?
अपने लिए उठाई आवाज़ तो,
"नारीवाद की नेता" कह दी गई।
अगर चुपचाप सबकी माने,
तो "Mother India" बना दी गई।
खुद के लिए थोड़ा सा जीना चाहे तो स्वार्थी,
और परिवार के लिए पूरी ज़िंदगी सेवा में गुज़ारे
तो "अच्छी माँ" का तमगा मिल गया।
दुनिया को जवाब दे तो लोग करें जज,
लेकिन दुनिया की सुने तो कहलाए बेचारी।
हर तरफ़ औरत क्यों झुकी है?
क्यों उसकी उड़ान हमेशा कतर दी गई है?
क्या महानता सिर्फ़ त्याग से मिलती है?
क्या चुप्पी ही सम्मान की कीमत है?
क्यों हर रिश्ते की परिभाषा
उसकी खामोशी से लिखी जाती है?
अब वक़्त है तस्वीर बदलने का,
औरत के सपनों को सच मानने का।
महान वही होगी,
जो अपने फैसले खुद लेगी।
वो चाहे बोले या चुप रहे,
चुने या त्याग दे —
उसकी पहचान वही होगी
जो वो खुद लिखेगी।