एक चिंगारी
छोटा सा गाँव था—नाम था "सूरजपुर"। वहाँ के लोग सीधे-सादे थे, मेहनती थे, पर ज़िंदगी जैसे ठहर सी गई थी। गाँव के बच्चे भी खेतों में काम करते थे।स्कूल जाना तो जैसे कोई सपना लगता।
इसी गाँव में था अर्जुन—पंद्रह साल का लड़का, आँखों में कुछ अलग करने की चमक। वो हर सुबह एक टूटी हुई साइकिल पर तीन किलोमीटर दूर स्कूल जाता। उसके पिता मज़दूर थे, और माँ बीमार रहती थीं। हालात मुश्किल थे, लेकिन अर्जुन का हौसला मजबूत था।
एक दिन स्कूल में एक नया टीचर आया—विवेक सर। पहले ही दिन उन्होंने सभी बच्चों से पूछा, "तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?"
किसी ने कहा डॉक्टर, किसी ने कहा इंजीनियर। सिर्फ अर्जुन चुप रहा।
टीचर ने उससे पूछा, "और तुम अर्जुन?"
अर्जुन ने कहा, "मैं बदलाव बनना चाहता हूँ, सर।"
विवेक सर मुस्कराए, "बदलाव तो एक चिंगारी से ही शुरू होता है। क्या तुम वो चिंगारी बनोगे?"
उस दिन के बाद अर्जुन बदल गया। वो और मेहनत से पढ़ाई करने लगा। वो स्कूल के बाद गाँव के बच्चों को पढ़ाने लगा—पेड़ के नीचे बैठकर, पुराने स्लेट और किताबों से। धीरे-धीरे उसके पास पाँच बच्चे हुए, फिर दस, फिर पच्चीस।
गाँव वालों ने पहले मज़ाक उड़ाया, पर जब उनके ही बच्चे बोलने, पढ़ने और सोचने लगे, तब वही लोग अर्जुन की तारीफ़ करने लगे।
सालों बाद, अर्जुन ने एक छोटी लाइब्रेरी खोली। फिर एक कंप्यूटर सेंटर। फिर गाँव का पहला स्कूल। वो खुद पढ़-लिखकर शिक्षक बना और गाँव लौट आया।
वो सिर्फ़ एक लड़का था। लेकिन उसमें थी एक चिंगारी, जिसने अंधेरे गाँव को रौशन कर दिया।
अब सूरजनपुर के बच्चे भी सपने देखते हैं, डॉक्टर बनने के, इंजीनियर बनने के, और सबसे ज़्यादा—एक चिंगारी बनने के।