साल कब गुजर जाता है?
भाग दौड़ में दिन ढल जाता,
कब सुबह, कब शाम हो जाता?
चिंता के बादल छा जाते,
सपनों का सूरज ढल जाता।
रोज़ कमाने दौड़ लगाते,
घर-परिवार के सपने सजाते,
रिश्तों की बातें रह जाती,
बस समय का पहिया चलता जाता।
कभी खुशी तो कभी उदासी,
कभी उलझन, कभी हंसी-ठिठोली,
यूँ ही दिन, हफ़्ते, महीने बीते,
और साल की आखिरी रात आ गई बोली।
बीते लम्हों को जब सोचा,
कुछ पाया, तो कुछ खोया,
जाने कब जनवरी आई थी,
फिर दिसंबर ने हाथ छोड़ दिया।
समय नदी सा बहता जाता,
बचपन, यौवन साथ छोड़ जाता,
भागमभाग में भूल न जाना,
जिंदगी हर लम्हा जीना सिखाता।