मैं और मेरे अह्सास
कोख में ही मारी जाती हैं हमारी बेटियाँ l
सब से आखिर खाती हैं हमारी बेटियाँ ll
भीतर से पूरी तरह टूटने के बाद भी l
होठों पर हसी लाती हैं हमारी बेटियाँ ll
पूनम के चाँद की तरह चमकते हुए l
पिता के घर आती हैं हमारी बेटियाँ ll
बेटी खैर मुखालिफ है बा वजूद की l
मोमबत्ती की बाती हैं हमारी बेटियाँ ll
सुबह आँगन को ताजगी देने के लिए l
मंगल कामना गाती हैं हमारी बेटियाँ ll
जिसको बेटो के अरमान होते हैं उनको l
एक आंख नहीं भाती हैं हमारी बेटियाँ ll
छोटे बड़े सब को जीवन देने वाली ही l
जिन्दगी नहीं पाती हैं हमारी बेटियाँ ll
पढ़ाई लिखाई की महत्ता न समझे l
बिना पढ़ी रहती हैं हमारी बेटियाँ ll
सखी
दर्शिता बाबूभाई शाह