माँ ...!
काश मैं भी लड़की नहीं
एक लड़का होती.......
तब निश्चिंत होकर तू भी सोती
और मैं भी सोई होती
माँ...! काश मैं भी लड़की नहीं
एक लड़का होती........
नहीं भय होता अस्मिता का
न प्रश्न उठता सहिष्णुता का
न हीं पुरूष आंतकी विडम्बनाओं से दो चार कभी मैं होती
माँ...! काश मैं भी लड़की नहीं
एक लड़का होती.........
न सुरक्षा का भय ही होता
न संशय में ये जिंदगी होती
न पूछती की यहां सी सी टी वी है
न नर जाती का आश्रय ही लेती
माँ..! काश मैं भी लड़की नहीं
एक लड़का होती.........
घुमती संग साथियों के अपने
मनमौजी जिंदगी मेरी भी होती
तब जिंदगी शायद...! मेरी
इतनी दुभर भी न हुई होती
माँ...! काश मैं भी लड़की नहीं
एक लड़का होती............
क्यों पुरुष में संवेदनहीनता है
मानवीय मूल्य नहीं केवल हिंसा है
काश इनके हृदय में भी कोई
इक कोमल स्त्री धड़क रही होती
माँ....! काश मैं भी लड़की नहीं
एक लड़का होती........
पढ़ा लिखा मुझे काबिल बनाया
गीता उपदेश रामायण पाठ पढ़ाया
बनी डाॅक्टर हर कर्तव्य निभाया
काश ये जिंदगी ही मेरी हुई होती
माँ...! काश मैं भी लड़की नहीं
एक लड़का होती...
जब लुट गया मेरा संसार सारा
फिर भी दया का कहां मिला सहारा
हर ओर से मुझे क्यों तोड़ा गया
काश इन वहशियों में थोड़ी मानवता जीवित होती
माँ...! काश मैं भी लड़की नहीं
एक लड़का होती........
न अत्याचार न बलात्कार का ही
कड़वा दंश मैंने भोगा होता
जीवित होती मैं भी आज संसार में
और सारे सुखों को भोग रही होती
माँ...! काश मैं भी लड़की नहीं
एक लड़का होती........
काश....!
©शीतल शैलेन्द्र देवयानी