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मारे जाओगे! अगर तुम्हारे पास आत्मबोध नहीं है, तो सच कहता हूँ—तुम मारे जाओगे! मारे जाओगे अज्ञान से, अंधविश्वास से, डर से और लालच से। मारे वे भी जाएँगे, जो सब जानने का स्वांग रचाते हैं; मारे वे भी जाएँगे, जिन्होंने उच्चतम को बाँटना नहीं सीखा। मारे जाएँगे वे अपने ही धोखे से स्वयं भी! अगर उच्चतम को समझा है, तो इसे आगे बढ़ाओ, आगे बढ़ाओ सही संभावनाओं को। जगह कितनी भी पवित्र हो, अगर तुम अज्ञानी रहे, तो उसे भी अज्ञान से भर दोगे। तुम अपनी सीमाओं को तोड़े बिना, उसे भी किसी सीमा में बाँध दोगे! बाँध दोगे उसे भी, जिसका निरंतर प्रवाह है, बाँध दोगे उसे भी, जो अस्तित्व में गतिमान है। ऐसे हो जाओ कि बाँधने का स्थान “समझ” ले तुम्हारी, कुछ फिसलने से पहले समझ आए फिसलने का अस्तित्व!
सौंदर्य 🍁 समय के जिस कालखंड ने सौंदर्य को परिभाषित किया, कभी उसी काल-विशेष ने, उसे असुंदर बना दिया। सुंदर और असुंदर के द्वंद्व में हम ऐसे उलझे— कि जो मिला जन्मदाता से, उसे भी अपनी सुंदरता के तराजू पर तौला; कमतर लगा जब हमें, तो हम आभूषण ले आए। आभूषण ये न थे— हमारी आँख, कान, नाक और यह निर्मल शरीर; हमने तो बस इन्हें अपनी परिभाषाओं से सुसज्जित कर दिया। सौंदर्य कुछ जोड़ने या लादने में नहीं है, अगर दृष्टि हो, तो उस शांत, निर्मल नग्नता में भी सौंदर्य है। सौंदर्य है—”मैं” के न होने में, “मैं” का होना ही असौंदर्य को बढ़ाता है। असौंदर्य वह भी है, जो पर्याप्त की सीमा लांघकर अपर्याप्त के पीछे भूखा दौड़ता है। असौंदर्य वह भी है, जो आभूषणों और मुखौटों के पीछे खुद को छिपाता और बचाता है। और इस असौंदर्य को देख पाना ही, वास्तविक सौंदर्य में प्रवेश है। ~ कपिल तिवारी “यथार्थ”
आत्म-छल जब मैं उससे बोलता हूँ— “चल, बाहर कहीं?” तो जवाब आता है— “यहाँ ठीक तो है।” मैं बोलता हूँ— “तुम डरते हो?” जवाब— “मैं? कहाँ!” मैं बोलता हूँ— “तुम्हारी संभावनाएँ उच्चतम हैं!” जवाब— “मैं संतुष्ट हूँ।” मैं पूछता हूँ— “सच में?” जवाब— “और नहीं तो क्या!” मैं बोलता हूँ— “फिर तुम बार-बार ठोकरें क्यों खाते हो?” जवाब— “यही तो ज़िंदगी है।” मैं पूछता हूँ— “सच में?” जवाब— “और नहीं तो क्या!” मैं उससे टूटन भरे सवाल पूछता नहीं, वह मुझे टूटन भरे उत्तर देता नहीं। मैं जीवन भर ठोकरें खाता रहता हूँ , और वह इसे ‘ज़िंदगी’ का नाम दे देता है! इसी झूठ पर हमारा रिश्ता आज भी कायम है… शायद यह झूठ ही है! यह सहारा… आखिर कब तक? ~ कपिल तिवारी “यथार्थ”
कॉकरोच: एक प्रतिरोध🪳 तुमने महज़ लिया था एक नाम—'कॉकरोच'। वे अतीत में भी थे, आज भी हैं, और हमेशा रहेंगे। लेकिन तुमने कुछ इस कदर 'कॉकरोच' बोला, कि हम उस घृणित परजीवी से अलग हो गए। अलग हो गए हम उस व्यवस्था से भी— जो व्यवस्था के गटर में पनपती है, सच को सरेआम छलती है, और घोटालों के अँधेरे में जीती है। "जो परजीवी हैं, वे अपने महलों में छिपकर बैठ गए; और जो अपने हक़ के लिए लड़े, तुमने उन्हें 'कॉकरोच' कह दिया।" हाँ, हम कॉकरोच हैं! क्योंकि हम हर चोट सहकर भी ज़िंदा रहते हैं। व्यवस्था की नज़रों में जो महज़ एक कीड़ा है, जब उसने व्यवस्था के भ्रष्टाचार को कुतरना शुरू किया, तो तुम बोले—"ग़लती हो गई!" बात अब महज़ ग़लती मानने की नहीं है, अब तो ग़लती करने वाले को सबक सिखाना होगा। जो बैठ गया है उस ऊँचे पद पर, जिसके लायक़ वह कभी था ही नहीं, उस दायित्व की ख़ातिर अब उसे कुर्सी से उतरना होगा। अब 'कॉकरोच' उस अस्तित्व का नाम होगा, जो व्यवस्था की इस गंदगी को साफ़ करेगा। "अचरज देखिए, जो समाज के असली परजीवी हैं, वे गंदगी साफ़ करने का वादा करके, ख़ुद गंदगी फैला रहे हैं! झूठ सिर चढ़कर महलों से बयानबाज़ी कर रहा है, और विडंबना यह कि सच, ख़ुद को साबित करने के लिए लड़ रहा है।" हम लड़ेंगे, हम लड़ेंगे, हम लड़ेंगे! ~ कपिल तिवारी "यथार्थ"
आशुतोष से रौद्र✨ तुम इतने ऊंचे हो कि मैं मौन हूँ, उस ऊँचाई तक न पहुँचा, तो 'गौण' किया तुम्हें। 'गौण' स्वभाव नहीं तुम्हारा, माया तुम्हारी है, और खेल भी तुम्हारा! उपयोगी लगे तुम, तो घर ले आए, नहीं लगे—तो विसर्जन के नाम पर फेंक आए। तुम्हारी ही माया से, तुम्हारा मूल्य तय होता है; नदी कब नाला बन गई, आराधना कब कर्मकांड, और मूर्ति कब व्यापार बन गई? मानव सभ्यता की विद्रूपताएँ ऐसे सामने आईं, कि अब आना ही पड़ेगा तुमको! आओ सुधार के लिए; रूप प्रलय का हो, तो भी ठीक है। बजे डमरू, विध्वंस हो उस अहंकार का— और उससे उपजे इस समस्त संसार का। प्रलय अब नहीं, तो कब? अहंकार अब बेहोशी की सीमा पार कर रहा है, पंचभूतों पर भी अधिपत्य का प्रयास कर रहा है। आओ महादेव! इनके कष्ट हरो, तारो इन्हें और इस जग को भी। तुम जिस भी रूप में आओगे, स्वीकार्य होगा हमें, तुम जिस भी रूप में तारोगे, स्वीकार्य होगा हमें। स्थिति वहीं है, जहाँ 'आशुतोष' की परिभाषा का अंतिम चरण— और 'रौद्र' की परिभाषा का प्रारंभ है। अब उठो समाधि से, अब विलंब ठीक नहीं; बहुत सह लिया तुमने, और सहना अब ठीक नहीं। मैं वरदान माँगता हूँ... मैं विध्वंस माँगता हूँ! ~ कपिल तिवारी "यथार्थ"
असहज द्वंद्व✨ तुम्हें मैं क्या समझूँ? तुम्हें समाज ने सताया या तुमने समाज को? मैं डर जाता हूँ, जब तुम मुझे देखते हो। तुमने अपने चरित्र को ऐसा विचित्र बनाया, जिससे केवल विचलितता जन्म लेती है। तुम्हारे अजीब वस्त्र, गले में अनेकों मालाएं, शरीर पर राख, सिर पर टोपी और चश्मा, गले में लटकती सीटी—जब तुम चलते हो, तो सच यह है कि 'स्वस्थ मनुष्य' की परिभाषा, तुमसे कहीं मेल नहीं खाती। तुम कहीं भी मल त्याग करते हो, कहीं भी गंदगी, कहीं भी सो जाते हो; स्वच्छता से तुम दूर भागते हो। गालियाँ तुम्हारे मुख से धारा-प्रवाह फूटती हैं— कभी भी, किसी के लिए भी! तुम्हारी प्रजाति कम नहीं है, समय के साथ बढ़े हो तुम भी। कभी खुद को 'बाबा' कहते हो, कभी 'पागल', कभी कहते हो—"मैं दुनिया से परे हूँ," पर कभी शराब, तो कभी नाली में पड़े हो! तुम्हारे विचित्र चरित्र से जन्मी क्रियाएँ, मुझे गहरे तक असहज कर देती हैं। मैं स्वयं से प्रश्न करता हूँ कि— इस असहजता का जिम्मेदार आखिर कौन है? समाज, तुम, या मैं खुद? जो भी हो, मैं तुमसे सहजता की दोस्ती नहीं कर पाता। तुम मुझे ऐसे मत देखो... मैं जा रहा हूँ; तुम्हें तुम्हारी ही स्थिति में छोड़कर। मैं कामना कर सकता हूँ—तुम्हारे स्वस्थ होने की, या... स्वयं को तुम्हें समझने के लायक बनाने की। तुम स्वस्थ रहो! अलविदा। ~ कपिल तिवारी "यथार्थ"
मेरा जन्म ✨ तुमने मुझे जन्म दिया न जाने किस स्वार्थ बस, कहते हो जन्म देना आवश्यक हैं न जाने किस स्वार्थ बस। जन्म आपने दिया पर मैं विद्रोह न कर सका, जन्म लेना आपके यहां ये मेरा चुनाव न बन सका। अगर चुनाव होता तो सच में "मैं "जन्म न लेता, कारण मात्र एक खुद को खोने से बचा लेता। तुमने मुझे जैसा पाला - पोसा मैं बड़ा हुआ, तुमने मुझे जैसा खड़ा किया मैं खड़ा हुआ। हा तुमने दिया मुझे बो सब जो तुम दे सकते थे। तुमने मुझे, जन्म, अहंकार, वृत्ति, कामना आदि दिए क्योंकि यही दे सकते थे। हा तुमने मुझे बो सिखाया जो तुम सिखा सकते थे। तुमने मुझे, तुम्हारी बड़ी जाति, रोते नहीं, बड़ी इज्जत, पद, प्रतिष्ठा आदि क्योंकि यही सिखा सकते थे। तुमने मुझे सिखाया.... काम कम, दाम ज्यादा से ज्यादा। मेहनत कम, सुरक्षा ज्यादा से ज्यादा। तथ्य कम, बकवास ज्यादा से ज्यादा। शांति कम, दिखावा ज्यादा से ज्यादा। वास्तविकता कम, बनावटी ज्यादा से ज्यादा। सत्य कम, प्रतिष्ठा ज्यादा से ज्यादा। क्योंकि तुम मुझे यही सिखा सकते थे। तुम्हारी स्वार्थ भरी कामनाएं मुझे दबाती गई, तुम्हारी अपनापन की नीति मेरे अहंकार को बढ़ाती गई। हे समाज तुमने वो क्यों न सिखाया, जो सर्वोच्च है। क्या ये सर्वोच्चता अभी भी तुम्हारे पास हैं? अगर हैं तो बो सिखाओ अथवा ऐसे अहंकार के पिंडो को मत बढ़ाओ। अगर तुम सिखा सकते हो तो सिखाओ, सत्य, बोध, ये भूख हमारी हमेशा रहेगी, कारण मात्र एक अज्ञात के साथ अंधी दौड़..........। तुम्हे लग रहा हैं , मैं बढ़ रहा हूं । मुझे लग रहा हैं , मैं मिट रहा हूं। मेरे "मैं "का अंत ही प्रारंभ है, प्रारंभ में ही हैं नवीनता, प्रारंभ में ही हैं विलीनता। विलीनता में हैं शून्यता, शून्यता में हैं अनन्ता, अनन्ता में ही अंत हैं , अंत ही प्रारंभ हैं । - यथार्थ
नींद✨ तुम सो रही हों, पर मैं नहीं। मन तो हैं कि मैं तुमको जगा दूं , पर जगाऊंगा नहीं। मुझे पता है तुम बोलोगे कुछ नहीं, पर मैं तुमसे तुम्हारा निंद्रा का अधिकार छीनूंगा तो नहीं। हा तुमने मुझे अधिकार दिए हैं तो सही, पर मैं उन्हें संभाल पाऊं तो सही, मेरा मन जूझ रहा हैं तुम्हारी यादों से, यादें तो कहती हैं जगा दूं तुम्हे, पर विवेक नहीं। जगाऊंगा तो यादें विजय होगी, पर अधिकार का अर्थ ये तो नहीं। अंततः नहीं जगाता हूँ। सोओगे जब तुम विवेक से, तब अधिकार मात्र जगाना होगा। जब जाओगे तुम दूर खुद से, तब अधिकार मात्र लौटाना होगा। -यथार्थ
विचार ✨ आज समय फिर खेल खेल रहा है, फिर से वही पुरातन विचार ! क्यों उठते हो बार बार ,जब मैं हरा चुका कई बार ! क्या तुम्हारा अंत होगा कभी? शायद नहीं। आज मन में फिर वही विचार उठा ! क्यों उठता है ये मन में, कि कुछ ठीक नहीं हैं। क्या यह उचित विषय है, या मात्र विचार है। क्यों उठता है ये मन में, कि मिटा दूं खुद को ! तुम कहते हो सब ठीक हैं, क्या वास्तव में सब ठीक है! मेरे मिटने से अंततः सब ठीक होगा क्या? अगर हॉ तो मिटाऊं खुद को, अगर न तो फिर क्यूं? क्या ख़ुद की ओर जाने का सिर्फ यही एक रास्ता है? ख़ुद को मिटा कर अगर शांति मिलेगी भी तो किसे ? मैं विकल्प खोज रहा हूं देह में रहकर शांतमय होने का, यात्रा जारी है.................................. ख़ुद की ओर। - यथार्थ
मैं कुछ खोज रहा हूं ✨ जब नहीं मिले थे तुम तब बैचेन था, और अब भी हूं। था लगा मुझे कि सुकून (चैन) हो तुम, लेकिन मैं गलत था। मैंने अनगिनत प्रयोग किए, बेचैनी को चैन में बदलने के, परिणाम मात्र एक, बेचैनी का और उन्नयन हुआ, प्रयोगों में शामिल थे तुम और सारा जहाँ (संसार), जहाँ (जगह) मैं प्रयोग कर रहा था। लक्ष्य मात्र एक , बैचेनी को चैन में स्थापित करना। क्या यह बाहरी प्रयोगों से संभव है भी ? अगर होता तो फिर इतनी बेचैनी क्यों ? हर प्रयोग में गलती मात्र यही, कि ख़ुद पर प्रयोग नहीं, जब खुद को उतारा ख़ुद पर , आलोकन हुआ खुद का, अवलोकन का परिणाम मात्र एक, अवलोकन करने वाला ही आलोकमय हुआ। - यथार्थ
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