मैं उलझा हुआ सा ख्वाब कोई,
तू सुलझी हुई शांत प्रिय,
मैं शहर का शोर शराबा,
तू गांव की शांत प्रिय,
मैं दूरियों का पैमाना,
तू हसीन मुलाक़ात प्रिये,
मैं दोपहर की चिकचीक ,
तू रात सी शांत प्रिय,
मैं इस दुनियां से थोड़ा अलग,
फिर भी मिलते है तुझसे ख़्यालात प्रिये,
मैं बिखरा हुआ सा जवाब तेरा,
तू सिमटी हुई सवालत प्रिये,
मैं कागज पर गिरी हुई स्याही,
तू उस पर तैरता हुआ जज्बात प्रिये,
पीकू.........