Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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चौपाई -
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कविता
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कविता की जो करते हत्या,
उनका आखिर मतलब है क्या।
कवि कविता के पथ चलता है,
गिरवी कलम नहीं रखता है।।

आओ कविता दिवस मनाएं,
कविता का भी मान बढ़ाएं।
कवि शब्दों का मेल कराएं,
धनी कलम के हम कहलाएं।।
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जीवन
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जीवन की हर सुबह नई है,
सबका ये भी भाग्य नहीं है।
हार बाद ही जीत लिखी है,
जीवन की बस रीति यही है।

जीवन की शुभ सुबह यही है।
जीवन की हर रीति वही है।।
समरस कब हर भाग्य दिखी है।
हार गये फिर जीत लिखी है।।
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देखो सबका दर्द बढ़ा है।
इससे उसका और बड़ा है।।
अपने सुख से कहाँ सुखी हैं।
दूजै सुख से बहुत दुखी हैं।।

मर्यादा दम तोड़ रही है।
हर चौखट ठोकर खाती है।।
पुरुषाहाल नहीं है कोई।
सिसक सिसक मर्यादा रोई।।

कुर्सी कुर्सी खेल रहे हैं।
अपनों की जड़ काट रहे हैं।।
हमको कुर्सी है अति प्यारी ।
कुर्सी यारी सब पर भारी।।

हार कहां हम मान रहे हैं।
बैसाखी ले दौड़ रहे हैं।।
कुर्सी पीछे दौड़ लगाते।
हित अनहित का भोज लगाते।।

लीला तेरी हमने जानी।
असली सूरत भी पहचानी।।
सूरत से तू भोला भाला।
तूने किया बड़ा घोटाला।

कैसा खेल निराला खेला।
द्वेष दर्प का ले के मेला।।
बहुत बड़ा तू है दिलवाला।।
आखिर कौन तेरा रखवाला।।

सुधीर श्रीवास्तव २०२४ चौपाई - कहें सुधीर कविराय २
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अब बदलाव हमारा जिम्मा।
रहना हमको नहीं निकम्मा ।।
आओ अपना देश बचाएँ।
लोकतंत्र मजबूत बनाएँ।।

सुध तो अब भी मेरी ले लो।
तनिक नजर रख साथी खेलो।।
हम भी शरण आपकी आये।
थोड़ा हमको भी दुलरायें।।

गणपति आज कृपा की बारी।
जीवन बहुत लगे अब भारी।।
सबकी लाज बचाओ अब तुम।
राहें सरल बनाओ सब तुम।।

कथनी करनी अंतर कैसा।
गलत सही जो कहना वैसा।।
मन में भेद कभी मत लाओ।
जीवन पथ पर बढ़ते जाओ।।

बजट नया फिर पास हुआ है।
वाक् युद्ध का द्वंद्व मचा है।।
सही ग़लत सब व्यर्थ की बातें।
सबके अपने स्वार्थी नाते।।

कर देती है जनता सारी।
बनी आज है वो बेचारी।।
काम सदन में कम हो पाता।
करते वहिष्कार क्या जाता।।

समय खेल ये कैसा खेले।
इसके ही तो सब हैं चेले ।।
लज्जा से अब काँपा हूँ मैं।
परछाईं से भागा हूँ मैं।।

आओ खेल नया हम खेलें।
जीत हार का ना गम झेलें।।
जलवा अपना क़ायम होगा।
खेल हमारा अनुपम होगा।।

बाबू भैया वोट करोगे।
जिम्मेदारी जब समझोगे।।
लोकतंत्र मजबूत बनेगा।
सोने से कुछ नहीं मिलेगा।।

मातु पिता आधार हमारे।
वे ही देते सदा सहारे।।
बात कभी ये भूल न जाना।
वरना होगा कल पछताना।।

किसने किसको कब जाना है।
किसने किसको पहचाना है।।
राज़ यही तो लुका छिपा है।
जाने ये किसकी किरपा है।।

हाथ रखा उसने जब माथा।

हमको जिसने भी जाना है।
लोहा मेरा वो माना है।।
तुम मानों अब मेरी बातें।
त्यागो मन की सब प्रतिघातें।।

नहीं हाथ कुछ आने वाला।
रहा नहीं कोई दिलवाला।।
मत दिमाग अपना चलवाओ।
नहीं किसी को अब भरमाओ

सुधीर श्रीवास्तव

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