मैं और मेरे अह्सास
जिंदगी संवार ने में वक्त ही बीत गया l
भूल को सुधार ने में वक्त ही बीत गया ll
ख़ामोश रखकर मोहब्बत किए गये तो l
दिल से पुकार ने में वक्त ही बीत गया ll
मन के गूगल में किताबें जिन्दगी पढ़ते हुए l
रात लम्बी गुजार ने में वक्त ही बीत गया ll
रोज मिलना मिलाना जारी रहे इस लिए l
जीती बाजी हार ने में वक्त ही बीत गया ll
आँखों की कश्तियों में बैठकर जा रहे थे l
पलकों में कतार ने में वक्त ही बीत गया ll
सखी
दर्शिता बाबूभाई शाह