इक रोज तुम मिले थे अजनबी बनके।
और अब तुम ही तुम हो ख़्वाबों और हक़ीक़त में।
मेरे अपनों में और सपनों में।
अब तो तुम्हारे लिए ही धड़कता है ये दहर।
तुम ही तुम बस नज़र आते हो मैं देखता हूँ जिधर ।
अँधेरों में, उजालों में। मेरे ख्यालों में बस तुम ही तुम हो..।
रिजवान रिज़