लफज-ए सिकायात सही,
यारान हक उठा के हाथ ।
हालतन् इज़्तिराब सब्र है,
सहमें यु बरक्स के हाथ ।
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फ़राखदार मुश्तरी जो कोई
ना मिला कदर-दान हमें ।
नक़द-ए-दिल जब बेचेंगे,
अहल-ए-वफ़ा मसला के हाथ।
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माँगी ज़कात-ए-हुस्न जो हमने,
अदा ए इलहाम तो क्या हुआ
नाज़-ओ-हया लिए मुँह पर वो भी,
छुपाते रहे, मालदार के हाथ ।
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वक़्त-ए-सवाल उठते हैं,
यदा ए यार अक्सर यहीं तो है
अदा-ए-हुस्न-ओ-जमाल
दूर से रंग-ए-हिना के हाथ ।
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अदा-ए-खंजरो सदाएह
कू’चे में नाम-बारों का खून है
अदा ए वस्ल क़ातिल को भी
खुदा ने दिए हैं क़ज़ा के हाथ ।
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आरास्ता-अंदाज़-ए-गुजर
शब-ए-वसल इस तरह
किसे नहीं है ख़त-ए-शौक
़ कोई तो बाद-ए-सबा के हाथ
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फकत जाम करता है
एक वार में चौरंग सैकरों
सोते वों है जागते वो हैं
मुझ को हिला के हाथ ।
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आह-ओ-फ़ुग़ान से घाव
भर दिए हैं सब रात के
दिखते वो शब-ए-ग़म में
ख्वाब-ए-षहर के हाथ ।
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अहल-ए-जहाँ से है
उनका एक ही पेशा
मिलते हैं हर बात में
अदब-ए-हया के हाथ ।
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इश्क में जो दर्द-ए-जिगर
अदा ए मदद को समझा गया
अदा वही जान सकता है
हुस्न-ओ-वफ़ा छोड़ के हाथ ।
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बरखा-ए बहार, हाला देख,
जब यु मस्ताना रंग छाया
आरास्ता-मर्ज है उसी
महफ़िल-ए-शाम के हाथ ।
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कुछ लोग नासमझे अंदाजे बला
इश्क-ओ-मोहब्बत का पैगाम
बेकार झुक जाते हैं कुछ फ़क़त
ज़ुल्म-ओ-सितम, दिनार के हाथ ।
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मिट्टी से बना है मगर हर एक
मोहब्बत रंग-ए-बहार आता है
उनकी राह ए बर्क में बनाते हैं
उसे वो अपने फ़िराक़ के हाथ ।
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सप्रेम-स्वरचित मनोरजंन मनोरथपूर्ण भाव सहित
अकथ बस, नेपथ्य में बहुत कुछ सामाजिक,आर्थिक और राजनैतिक परिदृश्य के मांनिद अपने आप मन के भाव को जोडे-समस्या को कसौटी पर परखे, केवल चितंन योग्य, मय आंनन्द
© जुगल किशोर शर्मा-बीकानेर-9414416705