क़ातिल की तीरगी देखी गई सुबह पसार में
शाम की जमी खुमारी, जुस्तजू ए रूह यार में
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महफ़िल में हुस्न-ओ-इश्क़ की बातें हुई बहुत
रूह ए कबीर ना मिला जो बसा था ख़याल में
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पुकारा दिल ए मांह उसने, मगर कोई चुप रहा
रूह ए आली बरस गुज़रे थे मोहब्बत की राग में
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गर भला वो शख़्स जो दिखाई नहीं दिया कहीं
रूह ए जलील बसा हुआ था हमारे ही प्यार में
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तला-तुम-ए-जिन्दगी, उसकी सूरत का नूर
रूह ए अंजीम लफ़्ज़ महकता उसके बयार में
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रूह ए मुकद्धस बुझते दिए में रौशनी की आस
रूह ए हाली दिल का हाल उसकी फुकार में
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दिल की हसरतें छिप गईं उस हिज्र में कहीं
रूह ए आली झलका चाँदनी रातके नशार में
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आँखों में बसी थी उसकी तस्वीर जब तलक
रूह ए बुजर्ग जीते, उसकी हसीन यादगार में
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बरखा रातें भी रो पड़ीं थीं हमारी तनहाई पर
रूह ए बेहतरीन, दर्द भी झेला, उनके इंकार में
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धड़कनें भी ठहर गईं उस पल के इंतिहा में
रूह ए शानदार, जब नज़र अपनी निगार में
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फिर भी न मिला सुकून दिल को उस लम्हे में
रूह-ए-अज़ीम-ओ-शान उसकी गहरी पुकार में
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इक उम्र बिता दी जां हमने उसके ख़्वाब में
मौज ए हयात आ सका कभी हमारे दयार में
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मंजिल ए जिन्दगी, जब आस दिल में रही क़ायम
तुफा ए जिन्दगी आएगा,गर ख़ीज़ाँ से बहार में
क़ातिल की तीरगी देखी गई सुबह पसार में
शाम की जमी खुमारी, जुस्तजू ए रूह यार में
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स्वरचित-कल्पना और सहज भाव में जिन्दगी सांमजस्य और सहयोग, समर्पण और समग्र मानववाद पर प्रयास आप सबमें, सब आपमें पढें,समझें और तंकिद अवश्य करे
© जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर मो 9414416705