हर लहर-ए-ज़िंदगी में, क्यु जची है
अज़ीम रूह जिन्दगी सुकूनत बसी है,
खुद के ग़हरे इल्म में, हक़ीक़ी तपी है
जब कायनातो, हवाओं में पता चली है
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मुसीबत की गरजने वाली गहराई में,
जिन्दगी क्यु हर बार दौराहे में रूह,
प्हचान, दुनिया के बंधनों से आज़ाद,
खुद के इल्म में, अपना रास्ता ढूंढती है।
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ख़ुशी एक परसुकून फूल की तरह खिलती है,
मौक़ाती बिखरे जमाने के बारे में,
मवाज़ों में इस की हमेशा की रोशनी में,
ऐसी रूह के लिए, कोई भी हक़ीकत बन सकती है ।
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जिंदगी के आशूब भरे समंदर में,
एक अजीम रूह सुकून ओ आजादी,
खुशी या गम से मंसलन तो नहीं,
खुद के इल्म में, बेइंतहाई चुनती हैं।
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मवाज़ने में उन की रौशनी में कमज़ोर होते हैं,
क्योंकि वो सच्चाई को रोशन करते हैं,
उन की नज़र की ख़ामोशी में,
हिकमत का डर है जिन्दगी खरी है।
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स्वरचित-कल्पना और सहज भाव में जिन्दगी सांमजस्य और सहयोग, समर्पण और समग्र मानववाद पर प्रयास आप सबमें, सब आपमें पढें,समझें और तंकिद अवश्य करे
© जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर मो 9414416705