बुज़दिल मुहब्बत दिखाना ये जो तरीका है,
सिर्फ़ बाजबहादुर गर रोज का सलीका है।
खुद को पाने का बेहतर पर तकलीफदेह,
है दूसरों की खिदमत गर खुद को जीना है।
इमानदार इख्तिलाफ, तरक्की या निशानदेह,
जब सच बोलें, गर जहर ए घूंट बस पीना है ।
हर रात बस सोते वक्त मौत को पतालेह,
सुबह उठकर गर नये जीवन को सीखना है।
पंछीयो को देखो, कल का ठोर या सालेह,
लम्हा-बा-लम्हा जीते गर, हमे भी जीतना है।
इंसान को अपना गुस्सा, सोने से पहले भूलादेह,
सुकून की नींद, गर दिल को राहत इल्तिजा है।
इंसान वही बनता है, जो अपने आपको बदलेह,
अगर यकीन हो, गर, नामुमकिन भी मुमकिना है।
गहरे यक़ीन से ‘नहीं’ कहना, बेहतर है,
ख़ुशी ‘हाँ’ कहना गर, बहके नतीजा है।
मेरी जिंदगी, मेरा पैगाम बहदवासेह ,
हर पल, हनेकाम गर, वा जरिमाना है।
जो खिदमत अपनी ख़ुशी से की वजेह,
सबसे अज़ीम गर, हकीकत में वसीला है ।
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सप्रेम स्वरचित-मनोरंजन और आधुनिक जीवनशैली में शब्द हमारे जीवन में प्रतिदिन या कभी कबार सुनाई देने वाले से परिचय पूर्वक ही है उद्देश्य भी यही है कि आनंद और मस्ती से पढ़ा जाए @
आध्यात्म या नैतिकता के सरोकार सापेक्ष
जुगल किशोर शर्मा बीकानेर राजस्थान
मो 9414416705