शायद कॉलेज के दिन ही अच्छे थे.......
सारा दिन बोलना......
कभी न थकना......
वो दोस्तो के साथ जाना......
ढेर सारी बाते करना.......
आधा दिन इक्कठे बिता कर भी.......
यार आज तो टाइम ही नहीं मिला बात करने का कहना......
क्लास बंक करके कैंटीन में जाना.....
घर की रोटी छोड़ कर सब की रोटी खा लेना........
आने के बाद फिर फोन पर घंटो बाते करना .......
पता नहीं कब वो कॉलेज छूटा......
कब बाते बंद होने लगी.......
कब अपने से अपनो की बाते होने लगी.......
काश वो सब लोट सकता........
बस अब तो यही कह सकते है.....
वो कॉलेज के दिन ही अच्छे थे......
या बेफिक्री के दिन ही अच्छे थे.......