ग़ज़ल
मारा मारा फिरता है कभी यहाँ कभी वहाँ ,
इस जीस्त के लिए हसरते कितनी खास है ।
चाहकर भी नहीं छोड़ सकता हसरतों को कभी,
जहाँ में उलझा है इसमें किस पल की आश है।
सुनकर देखे कभी किसी को मशगूल होकर ,
अपने अपने किस्से रिवायत सबके पास है।
इज़्ज़त शौहरत गनीमत बटोरने में लगा है,
ये प्यास भुजेगी नहीं जबतक अंतिम सांस है।
पवन कुमार सैनी