झूठ बहुत बिकता है
नदी-नालों स बहता है,
वृक्षों सा उगता है
पग-पग पर मिलता है।
रावण सा रूप बदलता है
कंकड़-पत्थर सा चुभता है,
जिसके हाथों में होता है
उसे भी निगलता है।
दूर नहीं वह निकट ही है
हम पर ही खिलता है,
बाजार बड़ा, रूप सफेद
झूठ बहुत बिकता है।
*** महेश रौतेला