कोई चलता पद चिन्हों पर, कोई अपना रास्ता स्वयं बनाता।
बस वही सूरमा है वीर-पुरुष, जो दुनिया में पूजा जाता।।
देता जो संघर्षो को न्योता, मानवता की खातिर इस जग में।
ठोकर से करता दूर सदा, जो भी बाधा आती पग में।।
जो दान रक्त का देकर भी, अपना कर्तव्य निभाता है।
बस वही सूरमा है ...
हम सब उनकी संताने है, आरो से जिनके शीश कटे।
शान से अर्पित किया खुद को, मातृभूमि के चरणों में।।
लेकिन पग पीछे नहीं हटे जिनके, हम वही सनातनी हिंदू है।
जो उनके आदर्शो पर चलकर, पुरखो का मान बढ़ाए।।
बस वही सूरमा है ...
मेरे इस लेख को कविता मत समझना, ये एक त्यागी की व्यथा है।
भूलो मत इतिहास अपना, तुम कौन हो ?
ये आजादी किसी खैरात में नहीं,
ना जाने कितने वीरो के बलिदान से मिली है।
लिखना तो बहुत कुछ है, बस शब्दों की गरिमा है।।
बस वही सूरमा है ... - ©️ जतिन त्यागी