#Time
मैं और मेरे अह्सास
कितना बदल गया इंसान l
किससे रखे अब पहचान ll
वक्त की न कोई कदर उसे l
ख़ुद ही विधाता ये अभिमान l
रुपीया पैसे ही उसका धरम l
जीते जा रहे झूठी ही शान ll
अपनों को ठुकराके सोचता l
धन दौलत से होती है आन ll
जाके महफ़िलों में सदा ही l
गाता अपना ही गुण गान ll
सखी
दर्शिता बाबूभाई शाह