हम सब में जिंदगी, गर दरिया समन्दर हैं
बे-वज़न दगाबाज, इकतेदार हमसफ़र हैं
हम सब हैं जिंदगी, जो बनाकर मिटाकर हैं
सोना चाँदी मिटटी, जख्म रोटी गरअसर है
दरिया से हम चले, मगर दरिया से जुदाकर गर है
जिसे हम समझते हैं, वो ख्वाब हकीकत मगर है
हम सब हैं जिंदगी, जो ताजरूबा-ए-हस्ती सर हैं
हर आह से मोहताज, हर ख़ुशी अदल बदलकर है
लब-ए-दरिया पर, हर एक कदम सोच में पर है
हम दरिया से दूर, मगर दरिया हमगर बसकर है
हम सब हैं जिंदगी, जो लहरों की कहानी भर है
जो दरिया में घुल कर भी, दास्तान-ए-मुंतज्जर है
Inner & outer worlds as one? Explore the omnipresent Self.
A swirling galaxy merging with a human silhouette.
The Fullness Within: A Poem on the All-Pervasive Self #Poetry #DivineEssence #Eternal