ऐसे ही जिन्दगी
अकड़ती रही,बिगड़ती रही
धधकती रही,चमकती रही
लुटती रही,जौहर में समाती रही।
ऐसे ही जिन्दगी
नदी तटों पर उमड़ती रही
एकान्त से डरती
भीड़ से घबराती,
रणकौशल सीखती
लड़ाई में ऐंठती रही।
राज भी की
गुलाम भी बनी,
समय के साथ-साथ
बाग-बगीचों सी खिलती रही।
** महेश रौतेला