मन से मैल कहीं न निकला
तन को बूंद बूंद नहलाया।
झूठ बोलकर आप फसाया।
कितना रोग लगाया।
माटी का तन, माटी का मन
फिर क्यू करता कंचन काया।
झूठी राखी पोत पोत के
ईश्वर को बस हूर बताया।
माया में डोलत फिरत स्वयं कहावत रंक।
आपुही जग भोगत फिरे , हमें बतावत संत।
ये जग सारा बावरा क्या नृप क्या ही फकीर।
बोलन को सब मर रहे ,सुनन को न कोई पीर।
बानी ,पानी देश की माटी दीन्ही बेच।
जो जग को तृप्ति करे , वा को चोकर देत।
ना जग को, न जंग को, न साथी को भान।
ते नर फिर ढूंढत फिरे जंगल और मशान।