झरना झरता है
नदिया बनकर
नदिया बहती है
सागर बनकर
सागर बहता है
उथल पुथल कर।
मन भी देखो सागर जैसा
होता है मतवाला।
सौ झंझट में शामिल देखो
मन की करने वाला।
जो एकाग्र मनस्थिति में हैं।
वो है परम निराला।
प्रेम क्रोध से परे है देखो।
पी अमृत का प्याला।
राम नाम की गागरिया में
जपत फिरे वो माला।
काला विषधर नाग हो घेरे
फिर भी फर्क न पड़ने वाला।
झरना झरता....