भ्रष्टाचार:
देश दुधारू बना हुआ है
भ्रष्टाचारी देख रहा है,
पुष्पों के अन्दर कीट बैठ
खाना अपना खोज रहा है।
दाँत गाड़कर कुर्सी पर है
सर्प चूहा निगल रहा है,
मधुशाला में पड़ा हुआ है
लोक अपना भूल गया है।
टूटे रथ पर बैठा है वह
घोड़े उसके बेकाबू हैं,
खाते-खाते भूल चुका वह
लोकाचार को छोड़ चुका वह।
नद और नदियां खाली हैं
भ्रष्टाचारी सोच रहा है,
लोग विभक्त हैं, माया भारी
भ्रष्टाचारी देख रहा है।
* महेश रौतेला