ये हिजरत के जमाने क्या आशियाँ ना हैं,
दूर हो कर रिश्ते को कैसे उम्र भर निभाना हैं,
खुशियाँ जलील हैं की उसका फोन आया हैं,
सितम यह भी खैरियत पूछना ए कैसा बहाना है,
समज कर जाल उनके और बिछड़ जाना कैसे बंदगी हैं ,
जला नहीं सकती धूप फिर भी वो तो जरूरत का आशियाँ हैं,
नमाज मे पढ़कर उसके नाम ढूँढ ते गुमते ये कौनसी किताब का पन्ना हैं,
कहीं दिखे तो देखते ही उसे अश्को से समजाना हैं, ना माने तो खुदा के घर लौट जाना हैं।
DEAR ZINDAGI 🙏