खुद का क्या हाल बना लिए हो बेख्याली बाबू। कभी देखे हो खुद को, कितने उलझे हो? फिर भी माथे पर एक शिकन नहीं।
इतना अंधा हो जाना भी सही नहीं है। बेहोशी को त्याग दोगे, भीतर झाँकने के क्रम में बाहर देखना ही भूल गए। ये मत भूलो आपका शरीर बाहरी है। आप इसके बिना कुछ नहीं है। ख्याल रखिये।