नैनीताल(एक लघुकथा)-एक साथ-११
मैं पहाड़ी से उतर
मालरोड को तय कर रहा था
छात्रावास को देख
शायद मन ने कहा
"ऊँ स्नेहाय नमः"
केवल झील ने सुना
देवदार ने समझा,
फूलों ने संवेदना भाँपी
हवा कुछ बेतरतीब बही
बादलों ने गर्जना की,
मूसलाधार बारिश में
मैं आश्रय ढूंढता
किंकर्तव्यविमूढ़ हो
पुस्तकों की दुकान में बैठ गया।
एक पुस्तक उठायी
जो सामाजिक, आर्थिक, व्यापारिक, धार्मिक होते हुये राजनैतिक थी,
स्नेह से भीगी
पृष्ठों में दबी दबी
मन को कचोटती
अन्त में हँसने लगी थी।
मैं प्यार के बहुत निकट था
मानो चक्रव्यूह के अन्तिम द्वार पर
निहत्था खड़ा था।
*** महेश रौतेला