गूंजती थी कभी मां की लोरियां,
अब वो शहर वो घर खाली पड़े हैं,
जहां खेलता था बचपन कभी,
वो दर वो जमाने खाली पड़े हैं,
गूंजती थी कभी.....
थक के सोते थे हम जिन छतो पे,
अब वो छत वो बिस्तर खाली पड़े हैं,
गूंजती थी कभी......
सुकून से सोते थे जहां देर तक ,
अब वो दरियां वो चादर सब खाली पड़े हैं,
गूंजती थी कभी .......
चिड़ियां पंछी और कोयल जहां कूकती थी,
वो पेड़ वो मुंडेरे अब खाली पड़े हैं,
गूंजती थी कभी.......
बचपन बीते जमाना बीत गया, पर,
आज हम बिन वो खेल खिलौने खाली पड़े हैं,
गूंजती थी कभी मां की लोरिया,
अब वो घर वो शहर खाली पड़े हैं,,
---अन्जू