जिससे नही उम्मीद वहा
वक्त गुजारा जाता है,
अपनों के नाम पर दिल
दुखाया जाता है
है जिससे उम्मीद दिल
उसका भी दुख जाता है,
उम्मीद के दिये को बुझाया
जाता है
है ये दुनिया की फितरत
दुनिया की राह चलना पढ़ता है
अपनों के लिए भी मेहबूब
को किनारा क्या जाता है
उसकी भी तो खता नही
वो इस भंवर मैं फसा जाता है
,रिश्तों को निभाने मैं,खुद
बिखरता जाता है
तव्वजू रिश्तों को दे तो
मेहबूब बुरा मान जाता है,
साथ मेहबूब का निभाए तो,
अपनों को खोया जाता है
ये किस कश्मकश मैं उस
को आखिर जीना पढ़ता है,
दोनो ही सूरत मैं खुद को हराया
जाता है
ये उम्मीद का चिराग जलाए
रखने में,ना जाने कितना कुछ
उसे सहा जाता है
गुमनाम शायर