नैनीताल(एक लघुकथा)-एक साथ
मैं फिर आया हूँ माठूँ माठ
पुरानी पहाड़ियों के बीच,
प्यार का स्पर्श
वृक्षों सा खिला हुआ है,
झील निष्प्राण जो थी गत वर्ष
वह प्राणवान हो चुकी है,
ईश्वर कहाँ-कहाँ है
इसके प्रमाण ढूंढते-ढूंढते
पहाड़ चढ़ चुका हूँ,
मेरे उड़ने का वक्त
मेरे पास बैठा है,
वह जो नहीं दिख रहा है
उसे मैं देख रहा हूँ,
जो टूट चुका है
वह अनमोल लग रहा है,
नक्षत्रों से टिमटिमाते दिन
मन में फैल चुके हैं,
वह जो मुझे देवदार के नीचे मिला
उसपर सोच रहा हूँ,
जो मुझे झील के आसपास मिला
उसे पलट रहा हूँ,
नतमस्तक हूँ उस प्रकाश के आगे
जो भाररहित समय का चूर्ण है,
मैं मन को फैलाया हुआ
सब निगल रहा हूँ
लेकिन कुछ तो ऐसा है
जिसे निगल नहीं पा रहा हूँ
प्रणाम कर छोड़ दे रहा हूँ
जो शाश्वत है,अटक जा रहा है।
माँठू माठ-धीरे-धीरे
** महेश रौतेला