बाबूजी के लिए बेटी का हृदयस्पर्शी काव्य.
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सच बात पूछती हुं बाबूजी !
छुपाओ ना बाबूजी !
क्या याद मेरी आती नहीं?..2 (टेक.)
पैदा हुईं घर में मेरे मातम सा छाया था.
पापा तेरे ख़ुश थे,मुझे माँ ने बताया था !
ले ले के नाम प्यार जताते भी मुझे थे !
आते थे कहीँ से तो बुलाते भी मुझे थे !
मैं हुं नहीं तो ! किसको बुलाते हो बाबूजी?
क्या याद मेरी आती नहीं !......(2)
हर जिद मेरी पूरी हुईं, हर बात मानते !
बेटी थी मगर बेटों से ज्यादा जानते !
घर में कभी होली,कभी दीपावली आई !
सैंडल भी मेरी आई,मेरी फ्रॉक भी आई !
क्या कमाते थे बाबूजी?....
क्या याद मेरी आती............. (2)
सारी उमर ख़र्चे में कमाई में लगा दी !
दादी बीमार थी तो दवाई में लगा दी !
पढ़ने लगे हम सब तो पढ़ाईमें लगा दी !
बाक़ी बचा वो मेरी सगाई में लगा दी !
अब किसके लिए इतना कमाते हो बाबूजी?
बचाते हो बाबूजी.... क्या याद मेरी...(2)
कहते थे मेरा मन कहीँ एक पल ना लगेगा !
बिटिया बिदा हुईं तो ये घर, घर ना रहेगा !
कपड़े कभी गेहने कभी सामान संजोते !
तैआरियाँ भी करते थे छूप छूप के फ़िरोते !
कर कर के याद अब तो ना रोते हो बाबूजी !
क्या याद मेरी आती नहीं?..... (2)
कैसी परंपरा है ये कैसा विधान है?
पापा बतानां कौनसा मेरा जहाँन है?
आधा यहाँ आधा वहाँ जीवन है अधूरा !
पीहर मेरा पूरा है ना ससूराल है पूरा !
क्या आपका भी प्यार अधूरा !
ना पूरा है बाबूजी...... क्या याद.... (2)
सच बात पूछती हुं बताओना बाबूजी !
छुपाओना बाबूजी !.....क्या याद मेरी......(3)
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कवि :श्री संजयसिंहजी (बिहार )
सिंगर : मीनाक्षी ठाकूर (बिहार)