खामोशिया अब सवाल करती,
क्यों खामोश है तु
तेरा इश्क जिंदा है,
की कही मौत हो गई ,
तेरे इश्क के दिवाने की,
मेरे जज्बात सील बैठे होठों को,
आँसू बहना भूल गये राहों से,
आँखों ने पलके झपकाना छोड़ दिया,
जिश्म मे जान बाकी , जज्बात मर गये,
अब तो मर ही चुका बिन मौत के,
खामोशियों को बोल दो,
लगा मेरे इश्क के साथ ,
मेरे जिश्म को आग भी,
क्युकी अब इस दुनिया मे ,
खामोेशो की जगह नही बाकी,
शायद मर कर सुकून मिले,
मेरी रूह को, मेरे जज्बातो को।
खामोसियो को कह भी दो,
जिंदा लाशो से खेलना बंद करे।
भरत (राज)