थक गयी हूँ मैं, यूँ तुम्हारी धूरी की
परिक्रमा लगाते लगाते
के अब तो अपना गुस्सा
शांत कर सो जाओ
थोड़ी देर के लिए
इन बादलों का लिहाफ लिए कि
मेरे कंठ को भी जरा देर
अपनी प्यास बुझाने की
एक आस तो मिले
यूँ तो जन्मो संभव नहीं है
अपना मिलन कि
ग्रहण का आना भी तो एक एहसास है
किंतु फिर भी
प्रतिक्षित हो घूमती रहूँ मैं
तुम्हारे आस पास ही सदा 'धरा' की तरह
के मन को एक आस तो रहेगी सदा कि
तुम आस पास ही हो मेरे...कुछ समझें
मेरे हम दम मेरे दोस्त 🙂.... पल्लवी