भाषा समझौते की
चलो कुछ समझौते की भाषा बोले,
कुछ तेरे,कुछ मेरे इरादे लिखवा दे।
जो जहन में, वो कागज पर उतार दे,
लिखते है वो पल, जो गुजरे साथ मेरे।
समझौता लिखवा लेते अपने अलगाव का,
समझौते पर कुछ हिसाब आंसुओ का भी हो।
कुछ जो जज्बात ,खव्वाब टूट गए,
आधे अधूरे सपने जो छुट गए रहो में।
जब अलगाव से दूर तुम हुए थे,
चलो हमारी हरएक हरकत लिख देते है।
वो धीमी धीमी अपनी सुरुआत,
तूफान से अपने जज्बात,
बर्बाद होती अपनी जवानी।
कुछ खुशी कुछ गम का हिसाब लिख लेते है,
चल आज फिर एक समझोता कर लेते है।
अब ना तुम कभी मिलेगी,
ना हम कभी नजर आएंगे।
अगर कुदरत ने चाहा मिलना ,
तो शायद फिर समझोते के साथ ,
एक नया सफर फिर सुरू करेंगे।
भरत (राज)