रोटी कभी दुखी नहीं थी
जब माँ के हाथों आती थी,
पूरब,पश्चिम, उत्तर, दक्षिण
सबके साथ रहा करती थी।
रोटी जहाँ से मुड़ी हुयी थी
मैंने वहीं से तोड़ी थी,
दिन बड़े थे, रोटी छोटी
पर माँ के हाथ में मिठास बहुत थी।
रोटी तब मुस्काती है
जब माँ के हाथ से बनती है,
रोटी की यात्रा स्नेहिल
जो माँ के हाथ में रहती है।
* महेश रौतेला