मैंने सोचा इस वर्ष
सीधे शुभकामनाएं दे दूँगा,
घड़ी की सुइयों पर दृष्टि रख
तुम्हारा स्वर सुन लूँगा।
आगे के वर्ष आगे
पीछे के वर्ष पीछे,
मैं नहीं कही बात को
बिना रूके कह दूँगा।
सीधे प्रेषित करने को
हमारे पास बसंत है,
लेकिन हम पतझड़ में ही
बसंत की आहट सुन लेंगे।
* महेश रौतेला