फुटबॉल का गम
एक कोने में पड़ा है फुटबॉल
नहीं खेलता उसे कोई खेल
बेजान सा पड़ा है अलमारी में
नहीं देखा सूरज की रोशनी दिन में
जाना चाहता हुं ताज़ी हवा में
लेना चाहता खुली हवा मे
पर कोई दया नही खाता मुझ पर
यहां सिर्फ धूल जम गई मुझ पर
नहीं छुआ कई दिनों से कोमल घास
नहीं हुआ किसी के पैर छूने का एहसास
नहीं उछला विशाल गगन में
नहीं देखा वह खुला आसमान
जब से देखा है मालिक
हाथ में फोन । ~ Urvi