नव वर्ष हो साकार
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"खूबसूरत हर हराते चला गया
पिछला वर्ष...
अब नए अंदाज से आया,
नव वर्ष...
नयी उमंग,
नयी तरंग,
*नए अंकों का आकार
अवतरित हुआ अब
दो हजार चौबीस का
सुंदर सा परिवार*
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पर, 'विस्मृत ना कर सकी
मैं , पुराने रंग, पुराने संग'
अब नए, अंदाज में बनाऊंगी
नया संसार....
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अपनी कविताओं को दूंगी
अलहदा आकार....
सब अपनी नयी कहानी
लिखेंगे...
'मैं उसी पुरानी कहानी को
खंगालूंगी,
ठोक-बजाकर
उसका परिमार्जन करूंगी.
हो सका तो!
कर्मों का विभाजन करूंगी.
कुछ समय निकाल लाऊंगी
खुद के लिए..
बस आगे का जीवन बेहतर बनाऊंगी .
खुद के लिए...
खुद के लिए..
खुद के लिए..
--डॉ अनामिका---
०१/०१/२०२४