मित्रता संदेह का पात्र नहीं है।
प्रेम संदेह और संबंध दोनो का पात्र है।
उदाहरण
मित्र सुदामा कृष्ण से मिलने द्वारका जाते हैं।
और कृष्ण को सूचना मिलने पर कैसे कृष्ण दौड़ते हैं। उनके पीछे।
नरोत्तम दास जी ने कहा :
शीश पगा न झगा तन पर
प्रभु जाने को आही बसे कही ग्रामा।
धोती फटी सो लटी डुप्टी
अरू पाए उपनिही को नई सामा।
द्वार खड़ा द्विज दुर्बल एक
रहो चकीसो वसुधा अभिरामा
पुछत दीन दयाल को नाम
बतावत अपनो नाम सुदामा।
ऐसे बेहाल बिवाइन सो
पग कंटक जाल लगे पुनि जोए।
हाय महादुख पायो सखा।
तुम आए अटे न किते दिन खोए।
देखी सुदामा की दीन दसा करुणा कर के करुणा निधि रोए।
पानी परात को हाथ दियो नई।
नैनेन के जल सो पग धोए।
ये मित्रता है मित्र कुछ कही कभी किसी भी परिस्थिति में कहने को आजाद है।
अब प्रेम।
कृष्ण कभी बीमार हुए।
तो नारद को बोला की नारद जी
मैं ठीक तो हो जाऊंगा। न
नारद : अरे प्रभु आप स्वस्थ हो जायेंगे।
कृष्ण: तो एक काम करे तो शायद मैं ठीक हो जाऊं।
नारद : क्या प्रभु।
कृष्ण: आप जरा बरसाना जाकर राधा के पग धूली ले आइए। वह मिलते ही मैं ठीक हो जाऊंगा।
नारद गए।
और राधा से कहा की ऐसी बात है।
और भगवान कहते है की जो मुझे श्रेष्ठतम प्रेम करता होगा। उसकी रज कण मिले तो मैं स्वस्थ हो जाऊंगा।
राधा : हे नारद जी।
आप मुझे नर्क में धकेलना चाहते हैं।
उनको मैं अपनी रज धूली क्या एक कणिका तक नहीं दे सकती।
नारद चल वहा से।
रास्ते में रूखमणी का सदन देखा।
तो उनसे भी पूछा की क्या आप देंगी रज धूली।
जैसे ही उन्होंने सुना
वो तो लोट गई। और अंग अंग रोम रोम की कणिका उठाकर नारद को diya। और कहा की इसके उपरांत
अगर मेरे प्राण भी जाए तो ले जाना नारद।
तो मर्यादा राधा की भी थी
मर्यादा रूखमणी की भी थी।
परंतु
जब राधा मर्यादा के पास में है।
और रूखमणी मर्यादा से परे एक मित्र रूप में उनकी अर्धांगनी है।
आनन्द त्रिपाठी।