नैनीताल( एक लघुकथा)-३
हिमपात था
शहर शुभ्र-श्वेत हो चुका था,
पूस के महिने का दिन
कंपकंपा रहा था,
हिमयुग का विचार
आते ही अस्त हो गया,
बर्फ पर फिसलना
एक खेल हुआ करता था,
हिम के गोलों में
एक शरारत होती थी,
महाविद्यालय में मिल जाया करती थी
धूप की गरमी,
कक्षाओं के नूतन पाठ
कुछ सरल, कुछ कठिन,
इलक्ट्रोन का घूमना और
प्रोट्रान-न्यूट्रॉन से दूर रहना बहुत भाता था,
दूर तक झाँकना
सब कुछ बटोर कर लाना,
सब यादों में घुला।
चुनावी सरगर्मियां
मनमुटाव को सहेजना,
जीत का स्वाद
फिर हिम सा पिघल जाना
और पाँव तले जमीन घिसक जाना।
ठंड को जीतकर
पढ़ाई-लिखाई में तल्लीन
हम प्यार के शीर्षक लिखते थे।
सोचते थे
आखिर यह हिमपात रूकेगा,
बसंत आयेगा
और भेंट की आशा बँधेगी।
हमारे विरोध
समय के कटघरे में रह
स्वतंत्र नहीं हो पाते थे,
मनुष्य का सत्य
बहुरूपिया होता देख
हम चकित थे।
हिमपात एक खबर हुआ करती थी
विषाक्त भाव को छोड़,
हम मधुर हो
हिम में लोटपोट हो जाते थे।
हिमपात जो रास्तों को रोक
हमें मिलने देता था,
वृक्षों की टहनियों को झुका
बड़ा हो जाया करता था,
तन की गरमी
हिमपात की ठंड से मिलजुल कर
बातें किया करते थे,
हम साल दर साल गिरी बर्फ की
किंवदंतियां सुना
बर्फ को पिघलाकर पानी बनाया करते थे,
पानी में बर्फ को तैरता देख
वैज्ञानिक बहस छेड़ देते थे,
और मधुमक्खियों का छत्ता जैसा उसे मान लेते थे।
ऐसा लगा था प्रकृति की कविता है
मौन हँसता हिमपात,
इसकी हर पंक्ति
शुभ्र,श्वेत आवरण में
स्नेह में लिपटी, आँखें जगमगाती
ऊँचाई पर रहती हैं।
बादलों का इतना सफेद बोलना
मनुष्य की ईहा को
जगमगा देता है।
हम हिम से श्वेत न हों
पर हिम तो देख सकते हैं,
उसे छू सकते हैं
अथाह शीतलता महसूस कर
एक नूतन आभास पा सकते हैं।
शब्दों को आनन्द दे
जितना ही चुप, शान्त रहें
उतना ही प्यार बढ़ता है,
अथाह नहीं तो तैरने लायक बना रहता है।
हाँ, तो हम कहाँ थे
पाँचों दोस्त,
उस हिमपात में स्वर्गारोहण की बातें कर रहे थे,
पांडवों की उस यात्रा को
अन्तिम नहीं, प्रथम मान रहे थे।
** महेश रौतेला