उस दिन कोई तारीख नहीं थी:
उस दिन कोई तारीख नहीं थी
उस दिन कोई बरस नहीं था,
फूलों का सौन्दर्य खूब था
जंगल सबके साथ खड़ा था।
ऋतुओं का नाम नहीं था
मन की पूरी पहिचान नहीं थी,
धरती को जब पढ़ा गया था
मानव का इतिहास नहीं था।
बँट जाने को बनी थी धरती
ऐसा सबका अंदाजा था,
घर की चिन्ता बहुत बड़ी थी
मेहनत का बाजार गरम था।
कोई सत्य पर टिका हुआ था
कोई असत्य का संस्थापक था,
चलकर आया संसार जहाँ से
उस राह पर नाम नहीं था।
उस दिन कोई तारीख नहीं थी
उस दिन कोई बरस नहीं था,
समतामूलक स्वच्छ जल पर
कोई किसी का अधिकार नहीं था।
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* महेश रौतेला