-■शस्य चिर मैं■-
-----------------
मैं शिरा को मोड दूँ
प्रभंजन को ओढ लूँ,
आंकना मत कोई मुझे
~~~|~~~|~~~|~~~
मैं शिला सी भागीरथी
नीर नहीं अब मैं
विगत इतिहास का
शस्य चिर मैं
~~~|~~|~~~|~~~
मिथ्या के शस्य से दूर
अंबुज बन अंबु में तैर जाऊँ
अमृतोपम वाणी;सी धुंध बन
डगर बनू कारवाँ का
अरमान बनूँ स्वयं का
नव मानवता का भंडार बनूँ
~~~~~|~~~||~~~~|~~~~~
मत निराना तुम मुझे
मत गिराना तुम मुझे
निष्ठुर युग से दूर मैं
विषम क्षय को खत्म कर
मनुज दनुज को तोडकर
विश्वमानवता जोड लूँ
~~~~|~~~~|~~~|~~~~
रास नहीं अब गेह यह
रास नहीं अब गात भी
रास नहीं अब भेष यह
सृजन लौ से चमन तक
विहाग को चुपचाप ओढ
इस धरा को छोड दूँ
#डाॅअनामिका