1 :- ग़ज़ल "इश्क की यादगारें"
बड़ा एहसान हम फ़रमा रहे हैं
कि उन के ख़त उन्हें लौटा रहे हैं
नहीं तर्क-ए-मोहब्बत पर वो राज़ी
क़यामत है कि हम समझा रहे हैं
यक़ीं का रास्ता तय करने वाले
बहुत तेज़ी से वापस आ रहे हैं
ये मत भूलो कि ये लम्हात हम को
बिछड़ने के लिए मिलवा रहे हैं
तअ'ज्जुब है कि इश्क़-ओ-आशिक़ी से
अभी कुछ लोग धोका खा रहे हैं
तुम्हें चाहेंगे जब छिन जाओगी तुम
अभी हम तुम को अर्ज़ां पा रहे हैं
किसी सूरत उन्हें नफ़रत हो हम से
हम अपने ऐब ख़ुद गिनवा रहे हैं
वो पागल मस्त है अपनी वफ़ा में
मिरी आँखों में आँसू आ रहे हैं
दलीलों से उसे क़ाइल किया था
दलीलें दे के अब पछता रहे हैं
तिरी बाँहों से हिजरत करने वाले
नए माहौल में घबरा रहे हैं
ये जज़्ब-ए-इश्क़ है या जज़्बा-ए-रहम
तिरे आँसू मुझे रुलवा रहे हैं
अजब कुछ रब्त है तुम से कि तुम को
हम अपना जान कर ठुकरा रहे हैं
वफ़ा की यादगारें तक न होंगी
मिरी जाँ बस कोई दिन जा रहे हैं.
2:- ग़ज़ल "रोया था"
मौत से बड़ी थी,मैं उस सजा से रोया था
हर 1 रोता है, मैं जिस जगह से रोया था
आंसू थे जाते वक्त,उसकी भी आंखों में
वो मेरे लिए नहीं, मेरी वजह से रोया था
चूपा ले नया आशिक़,गले लगाकर उसे
बिछड़ कर हमसे ऐसी,अदा से रोया था
उसकी बेवफ़ाई पर तो,हंसना है मुझको
मैं हैरान होकर अपनी,वफ़ा से रोया था
मां चुपा ले मुझको, मैं रो रहा हूं वैसे ही
जैसे बचपन में,डॉक्टर की दवा से रोया था
3:- नज्म "ना होने का ख्याल"
घर के कोने में चुपचाप
जब तेरी परछाइयों को ढूंढता हूँ
हां, तेरे होने से ज्यादा
तेरे न होने का ख्याल आता है।
तेरी आहट जब भी मुझे नींद से जगा देती हैं
तो तेरे होने से ज्यादा
तेरे न होने का ख़याल आता है।
आईने में न जाने किस किरदार को ढूंढता
मैं हमेशा भूल जाता हूँ
कि तू कोई कहानी थी नहीं
तू तो मेरे उस कविता की तरह थी
जिसे मैंने महसूस किया था।
तेरी सांसों को
जब भी महसूस करता हूँ
सच में
तेरे होने से ज्यादा
तेरे न होने का ख़याल आता है।
हां कई दफ़ा
मैं तेरे हिस्से की चाय भी
खुद बनाकर पी जाता हूँ।
हां जब भी मेरी ख़ामोशी
मेरे लड़खड़ाते ज़ुबाँ से गुफ़्तगू करती है
हाँ तेरे होने से ज्यादा
तेरे न होने का ख़याल आता है।
मेरे बिस्तर पर तेरे पंख
आज भी गुदगुदी कर जाते हैं
और मैं अब बिस्तर से नीचे गिरता भी नहीं हूं,
क्योंकि मैं अब उसी ज़मीं पर सोता हूँ
जहाँ तूने पहली बार मुझे ओढ़ा था।
मैं बार बार जब भी
अपनी उंगलियों में
तेरी मौजूदगी देखता हूँ
सच कहूं तो
तेरे होने से ज्यादा
तेरे न होने का ख़याल आता है।
Preetam Gupta