ये कैसी मोहब्बत निभा रहा है वो?
ज़ख्म पे ज़ख्म देकर
फिर मरहम लगा रहा है वो....
बह रहे बेहिसाब मेरे आंसू
जिन्हें तमाशा बता रहा है वो....
ऐतबार की बात करके
ख़ुद सवाल खड़े करते जा रहा है वो
ये रिश्ता भी कोई रिश्ता हुआ
जिसमें मनमर्ज़ी चला रहा है वो......
ये कैसी मोहब्बत निभा रहा है वो?
हर बंधन से आज़ाद करके
ख़ुद का ग़ुलाम बना रहा है वो......
ज़ख्म पर ज़ख्म देकर
फिर मरहम किस बात का लगा रहा है वो?