मेरी रूह को सुकून देने वाला
मुझे बेचैन कर चला है
जिससे होती थी घंटों बातें,
वह मेरे संग 'खामोश' हो चला है.......
मेरे इश्क का घर
अब नहीं रहा पहले जैसा,
उसके चले जाने से
अब घर 'मकान' हो चला है.....
सोचने बैठूं,तो शुरुआत याद नहीं आती
सफर इतना तय कर लिया है
कि मेरी मंजिल भी
अब ये 'सफ़र' हो चला है.......
मेरा रिश्ता
उसकी सूरत से कभी रहा ही नहीं
मैंने तो उसकी समझदारी से मोहब्बत कर ली थी
जब उसे इल्म हुआ मेरे इश्क का
मुझ से रिश्ता तोड़ने के लिए,
तब से वो 'नादान' हो चला है....
उसे गुमान था,
उसके हुस्न के दीवाने हो
उसके हो गए हम!
कैसे समझाऊं उस फूल को,
उसकी महक से
यह मन 'भवरा ’ हो चला है.......
जब होती थीं बातें,
पल-पल करके दिन, महीनों में बदल गए
वक्त भी पंख लगा उड़ गया
और
अब हालात कुछ यू हो बैठे हैं
बिन बातों के
पल भी 'साल'हो चला है.....
एक मन तुम्हें रोकना चाहता है,
दूजा मन
तुम्हारे जाने के गम में 'बैरागी'हो चला है......
खुद से खुद की
ये मोहब्बत की जंग लड़ रही हूं
तुम्हारा जाना
"मेरे इश्क़ की हार"
और
"ज़माने की जीत"हो चला है........
मेरे रूह को सुकून देने वाला
अब मुझे बेचैन कर चला है..........