तुमने मेरे प्यार को समझा नहीं
या फिर तुमने समझना चाहा ही नहीं
शायद इसलिए तन्हा रह गई
जब जब तेरे साथ की जरूरत थी मुझे
तुम मौजूद होता ही नहीं
तुमने तवज्जों दी अपनी चाहतों को
मेरी ख्वाहिशों की तेरे लिए शायद कोई थी नहीं
तुम कहते हो समझती नहीं तुम्हारी मजबूरियों को
तुम ही कहो कैसे समझू आखिर
इन बढ़ती दूरियों को
माना फुरसत तुम्हें नहीं
बड़ी ही है मसरूफियत
मगर सिर्फ फुरसत के लम्हों में जताई उस मुहब्बत की हो कैसे अहमियत
kavya soni